Economics: Rapo Rate, Reverse Rapo Rate, CRR, SLR, Per Capita Income
अर्थशास्त्र के प्रमुख शब्दावली से कई बार परीक्षा में प्रश्न बनते हैं। कई बार आसान प्रश्न होने के बावजूद गलत हो जाते हैं। अर्थव्यवस्था से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जो कई बार सीधे रूप से परीक्षा में पूछे जाते हैं। उसके बारे में जानना बहुत जरूरी है।। यहां पर अर्थशास्त्र से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई है। Economics, अर्थव्यवस्था
भारतीय रिजर्व बैंक हर दो महीने में एक बार मौद्रिक नीति की समीक्षा करता है. मौद्रिक नीति की घोषणा के दौरान हर बार रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर जैसे शब्द आते हैं. आइये हम आपको रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर का मतलब बताते हैं. इससे आप यह भी समझ सकेंगे कि इन दरों में बदलाव से आपके जीवन में क्या असर पड़ता है.
1. रेपो रेट क्या है.Rapo Rate
जब हमें पैसे की जरूरत हो और अपना बैंक अकाउंट खाली हो तो हम बैंक से कर्ज लेते हैं. इसके बदले हम बैंक को ब्याज चुकाते हैं. इसी तरह बैंक को भी अपनी जरूरत या रोजमर्रा के कामकाज के लिए काफी रकम की जरूरत पड़ती है. इसके लिए बैंक भारतीय रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं. बैंक इस लोन पर रिजर्व बैंक को जिस दर ब्याज चुकाते हैं, उसे रेपो रेट कहते हैं.
रेपो रेट का आप पर असर
जब बैंक को रिजर्व बैंक से कम ब्याज दर पर लोन मिलेगा तो उनके फंड जुटाने की लागत कम होगी. इस वजह से वे अपने ग्राहकों को सस्ता कर्ज दे सकते हैं. इसका मतलब यह है कि रेपो रेट कम होने पर आपके लिए होम, कार या पर्सनल लोन पर ब्याज की दरें कम हो सकती हैं.
अगर रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ा देता है तो बैंकों को पैसे जुटाने में अधिक रकम खर्च करनी होगी और वे अपने ग्राहकों को भी अधिक ब्याज दर पर कर्ज देंगे.
2. रिवर्स रेपो रेट क्या है? Reverse Rate
देश में कामकाज कर रहे बैंकों के पास जब दिन-भर के कामकाज के बाद रकम बची रह जाती है, तो उस रकम को भारतीय रिजर्व बैंक में रख देते हैं. इस रकम पर आरबीआई उन्हें ब्याज देता है. भारतीय रिजर्व बैंक इस रकम पर जिस दर से बैंकों को ब्याज देता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं.
आप पर रिवर्स रेपो रेट में बदलाव का असर
जब भी बाज़ार में नकदी की उपलब्धता बढ़ जाती है तो महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है. आरबीआई इस स्थिति में रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दें. इस तरह बैंकों के कब्जे में बाजार में बांटने के लिए कम रकम रह जाती है.
3. नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर),CRR
भारत में कामकाज कर रहे बैंकों के लिए कुछ दिशा निर्देश बनाए गए हैं. ये नियम रिजर्व बैंक ने बनाये हैं. बैंकिंग नियमों के तहत हर बैंक को अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना ही होता है. इसे कैश रिजर्व रेश्यो अथवा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) कहते हैं.
आरबीआई ने ये नियम इसलिए बनाए हैं, जिससे किसी भी बैंक में बहुत बड़ी संख्या में ग्राहकों को रकम निकालने की जरूरत पड़े तो बैंक पैसे देने से मना न कर सके.
Q.4 सीआरआर का आप पर क्या प्रभाव पड़ता है? CRR
Ans. अगर सीआरआर बढ़ता है तो बैंकों को अपनी पूंजी का बड़ा हिस्सा भारतीय रिजर्व बैंक के पास रखना होगा. इसके बाद देश में कामकाज कर रहे बैंकों के पास ग्राहकों को कर्ज देने के लिए कम रकम रह जाएगी. और इस प्रकार कर्ज़ के दर में बढ़ने की संभावना होती है
आम आदमी और कारोबारियों को कर्ज देने के लिए बैंकों के पास कम पैसे रहेंगे. अगर रिजर्व बैंक सीआरआर को घटाता है तो बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ जाता है.
आरबीआई सीआरआर में बदलाव तभी करता है, जब बाज़ार में नकदी की तरलता पर तुरंत असर नहीं डालना हो. वास्तव में रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव की तुलना में सीआरआर में किए गए बदलाव से बाज़ार में नकदी की उपलब्धता पर ज्यादा वक्त में असर पड़ता है
Q.5 एसएलआर क्या है? SLR
रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में नकदी की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जिन उपायों का सहारा लेता है उनमें एसएलआर एक महत्वपूर्ण उपाय है. स्टेचुअरी लिक्विडिटी रेश्यो या वैधानिक तरलता अनुपात बैंकों के पास उपलब्ध जमा का वह हिस्सा होता है, जोकि उन्हें अपनी जमा पर लोन जारी करने के पहले अपने पास रख लेना जरूरी होता है. एसएलआर नकदी, स्वर्ण भंडार, सरकारी प्रतिभूतियों जैसे किसी भी रूप में हो सकता है.
जब बैंक इस अनुपात को सुरक्षित रख लेते हैं, उसके बाद ही उन्हेें अपनी जमा पर लोन जारी करने की अनुमति होती है. एसएलआर का यह अनुपात कितना होगा, इसका निर्धारण रिजर्व बैंक करता है.
भारत में एसएलआर की अधिकतम सीमा 40 फीसदी तक रह चुकी है. रिजर्व बैंक को बैंकों के लिए एसएलआर की सीमा 40 फीसदी और न्यूनतम शुन्य फीसदी तक भी रखने का अधिकार है.
Q.6 प्रतिव्यक्ति आय किसे कहते हैं ?
Q. What is Per capita income?
Ans: जब किसी देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद को जब उस देश की उस वर्ष की मध्यावधि तिथि की जनसंख्या से विभाजित किया जाता है प्रति व्यक्ति आय उस आय कहा जाता है। यह हमें उस देश के निवासियों को प्राप्त होने वाली औसत आय की मौद्रिक जानकारी देता है।
साधारण शब्दों में 1 वर्ष में देश में कमाए गए धन को अगर प्रत्येक व्यक्ति को बांटा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति को कितनी राशि मिलेगी इसी को प्रति व्यक्ति आय कहते हैं
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